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होर्मुज पर शिकंजा: ईरान की पाबंदी से वैश्विक तेल आपूर्ति संकट की आशंका, भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

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पश्चिम एशिया में इस्राइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव ने अब समुद्री व्यापार की सबसे संवेदनशील नस पर दबाव डाल दिया है। जवाबी रणनीति के तहत ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर पाबंदियां कड़ी कर दी हैं। यह वही संकरा समुद्री गलियारा है जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की ‘लाइफलाइन’ कहा जाता है। यदि यहां आवाजाही बाधित होती है तो असर केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एशिया से यूरोप और अमेरिका तक आर्थिक झटके महसूस किए जाएंगे।
होर्मुज फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार है, जिसके उत्तर में ईरान और दक्षिण में यूएई व ओमान स्थित हैं। करीब 161 किलोमीटर लंबा यह जलमार्ग अपने सबसे संकरे हिस्से में महज 21 मील चौड़ा है। दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल व्यापार का लगभग 20-25 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यानी हर चौथा तेल टैंकर इस गलियारे पर निर्भर है।
यदि ईरान यहां कड़े प्रतिबंध लागू करता है या आंशिक नाकेबंदी भी होती है, तो सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अल्पकालिक अवरोध भी कीमतों को 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक धकेल सकता है। साथ ही युद्ध-जोखिम बीमा और फ्रेट लागत बढ़ने से ऊर्जा आयात महंगा हो जाएगा। इसका सीधा असर वैश्विक महंगाई, शेयर बाजारों और मुद्रा विनिमय दरों पर पड़ेगा।
सबसे अधिक प्रभावित वे देश होंगे जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों को इस मार्ग से भारी मात्रा में तेल और गैस मिलती है। कतर, कुवैत और बहरीन जैसे निर्यातक देशों के लिए भी यह मार्ग अनिवार्य है, क्योंकि उनके पास व्यवहारिक वैकल्पिक पाइपलाइन विकल्प सीमित हैं। सऊदी अरब और यूएई के पास कुछ पाइपलाइन विकल्प जरूर हैं, लेकिन वे पूरी आपूर्ति की भरपाई नहीं कर सकते।
भारत की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है। देश अपनी जरूरत का लगभग 88-90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से करीब 40-50 प्रतिशत होर्मुज मार्ग से आता है। यदि यह रास्ता बाधित होता है तो इराक, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई से आने वाली आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल एक डॉलर की वृद्धि से भारत का वार्षिक आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यदि कीमतों में 20-25 प्रतिशत का दीर्घकालिक उछाल आता है तो चालू खाता घाटा और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ेगा।
हालांकि तात्कालिक संकट की आशंका सीमित है, क्योंकि भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और रिफाइनरियों का संचालन भंडार मौजूद है, जो कुछ दिनों की आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है। आवश्यकता पड़ने पर भारत रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लातिन अमेरिका से आयात बढ़ा सकता है। लेकिन इन दूरस्थ स्रोतों से तेल आने में 25 से 45 दिन तक लग सकते हैं, जबकि खाड़ी देशों से शिपमेंट 5 से 7 दिनों में पहुंच जाता है। इससे लॉजिस्टिक्स लागत और सप्लाई चेन पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
भारतीय उद्योगों पर भी असर संभव है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से एयरलाइंस, पेट्रोकेमिकल, ऑटोमोबाइल और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत बढ़ेगी। वहीं तेल अन्वेषण कंपनियों को ऊंची कीमतों से अस्थायी लाभ मिल सकता है। सरकार फिलहाल खुदरा पेट्रोल-डीजल कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश कर सकती है, ताकि महंगाई काबू में रहे।
कुल मिलाकर, होर्मुज पर ईरान की पाबंदी वैश्विक व्यापार के लिए चेतावनी संकेत है। यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी पर सीधा दबाव है। भारत के लिए चुनौती दोहरी है—ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखना और महंगाई पर नियंत्रण। आने वाले दिनों में संघर्ष की दिशा तय करेगी कि यह संकट अस्थायी झटका बनकर रह जाता है या लंबी आर्थिक परीक्षा में बदलता है।

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